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नर हो, न निराश करो मन को

नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो जग में रह कर कुछ नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो, न निराश करो मन को। संभलो कि सुयोग न जाय चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलंबन को नर हो, न निराश करो मन को। जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को। निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे सब जाय अभी पर मान रहे कुछ हो न तजो निज साधन को नर हो, न निराश करो मन को। प्रभु ने तुमको कर दान किए सब वांछित वस्तु विधान किए तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो फिर है यह किसका दोष कहो समझो न अलभ्य किसी धन को नर हो, न निराश करो मन को। किस गौरव के तुम योग्य नहीं कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं जन हो तुम भी जगदीश्वर के सब है जिसके अपने घर के फिर दुर्लभ क्या उसके जन को नर हो, न निराश करो मन को। करके विधि वाद न खेद करो निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो बनता बस उद्‌यम ही विधि है मिलती जिससे सुख की निधि है समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को नर हो, न निराश करो मन को कुछ काम करो, कुछ काम करो। . 

Poet : मैथिलीशरण गुप्त 

यह कविता हिंदी साहित्य के महान कवि मैथिलीशरण गुप्त की सबसे प्रेरणादायक रचनाओं में से एक है। इसमें आत्मविश्वास, कर्म, आत्मगौरव, और जीवन के उद्देश्य का अत्यंत सरल लेकिन गहरा संदेश है। कविता केवल प्रेरक पंक्तियाँ नहीं देती, बल्कि मनुष्य के भीतर सोई हुई शक्ति को जगाने का प्रयास करती है।


कविता का मूल भाव

पूरी कविता का केंद्रीय संदेश है:

मनुष्य को निराश नहीं होना चाहिए।
जीवन व्यर्थ न जाए, इसके लिए कर्म, प्रयास और आत्मविश्वास आवश्यक हैं।

गुप्त जी बार-बार “कुछ काम करो” कहकर निष्क्रियता पर प्रहार करते हैं। उनके अनुसार केवल सपने देखना पर्याप्त नहीं; मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।


stanza-wise व्याख्या

1. “कुछ काम करो, कुछ नाम करो…”

कवि कहता है कि मनुष्य का जन्म केवल खाने-पीने और समय बिताने के लिए नहीं हुआ।
जीवन का कोई उद्देश्य होना चाहिए।

“यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो”

यहाँ कवि existential प्रश्न उठाते हैं —
“हम क्यों जन्मे हैं?”

वे कहते हैं कि अपने शरीर, बुद्धि और जीवन को किसी उपयोगी कार्य में लगाओ।


2. “संभलो कि सुयोग न जाय चला…”

यह stanza अवसरों की महत्ता पर है।

जीवन में अवसर बार-बार नहीं आते।
यदि मनुष्य केवल दुनिया को सपना मानकर बैठा रहे, तो वह कुछ नहीं कर पाएगा।

“पथ आप प्रशस्त करो अपना”

अर्थात अपना रास्ता स्वयं बनाओ।
दूसरों के सहारे मत बैठो।


3. “उठके अमरत्व विधान करो…”

यह सबसे दार्शनिक भागों में से एक है।

कवि कहता है कि मनुष्य के भीतर दिव्यता और अमरता का तत्व मौजूद है।
मनुष्य केवल शरीर नहीं है; उसमें चेतना, साहस और सृजन की शक्ति है।

“स्वत्त्व सुधा रस पान करो”

अर्थात अपने असली स्वरूप को पहचानो।

यहाँ वेदांत और भारतीय दर्शन की झलक मिलती है।


4. “निज गौरव का नित ज्ञान रहे…”

यह stanza आत्मसम्मान पर आधारित है।

मनुष्य को स्वयं को तुच्छ नहीं समझना चाहिए।

“हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे”

यह पंक्ति आज के समय में भी अत्यंत प्रासंगिक है —
विशेषकर तब, जब लोग comparison, failure और social media validation के कारण स्वयं को कमतर समझने लगते हैं।


5. “प्रभु ने तुमको कर दान किए…”

कवि कहता है कि ईश्वर ने मनुष्य को बहुत क्षमताएँ दी हैं।

यदि हम उनका उपयोग नहीं करते, तो दोष ईश्वर का नहीं, हमारा है।

यहाँ कविता responsibility की बात करती है —
अपनी असफलता के लिए केवल भाग्य को दोष देना उचित नहीं।


6. “किस गौरव के तुम योग्य नहीं…”

यह stanza मानव क्षमता का उत्सव है।

कवि कहता है:

  • तुम ईश्वर की संतान हो

  • तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं

  • आत्महीनता छोड़ो

यहाँ राष्ट्रवादी युग की वह चेतना भी दिखाई देती है जिसमें भारतीय समाज को जागृत करने का प्रयास था।


7. “उद्यम ही विधि है…”

अंतिम stanza कविता का निष्कर्ष है।

“बनता बस उद्‌यम ही विधि है”

अर्थात परिश्रम ही भाग्य बनाता है।

कवि निष्क्रिय जीवन को धिक्कारता है और कहता है कि निरंतर लक्ष्य पर ध्यान रखो।


कविता की विशेषताएँ

1. सरल भाषा, गहरा संदेश

कविता अत्यंत सरल हिंदी में है, इसलिए यह बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी को प्रेरित करती है।


2. प्रेरणात्मक स्वर

हर stanza के अंत में:

“नर हो, न निराश करो मन को”

यह refrain (दोहराव) कविता को गीतात्मक और स्मरणीय बनाता है।


3. भारतीय दर्शन का प्रभाव

कविता में:

  • कर्मयोग

  • आत्मबोध

  • पुरुषार्थ

  • आत्मगौरव

जैसे भारतीय दार्शनिक तत्व दिखाई देते हैं।


4. राष्ट्रवादी युग की चेतना

मैथिलीशरण गुप्त ऐसे समय में लिख रहे थे जब भारत स्वतंत्रता आंदोलन से गुजर रहा था।
यह कविता केवल व्यक्तिगत प्रेरणा नहीं, बल्कि सामूहिक जागरण का भी आह्वान है।


आज के समय में प्रासंगिकता

यह कविता आज के छात्रों, लेखकों, कलाकारों, entrepreneurs, और हर उस व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है जो कभी निराश होता है।

आज:

  • distraction बहुत है

  • तुलना बहुत है

  • anxiety और hopelessness बढ़ रही है

ऐसे समय में यह कविता कहती है:

“अपने भीतर की संभावना को मत भूलो।”


कुछ अत्यंत प्रभावशाली पंक्तियाँ

“हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे”

“पथ आप प्रशस्त करो अपना”

“बनता बस उद्‌यम ही विधि है”

“कुछ काम करो, कुछ नाम करो”

इन पंक्तियों में पूरी कविता का सार समाहित है।


साहित्यिक दृष्टि से

यह कविता हिंदी की “उपदेशात्मक-प्रेरणात्मक कविता” परंपरा का उत्कृष्ट उदाहरण है।
इसमें:

  • अनुप्रास

  • पुनरुक्ति

  • लयात्मकता

  • ओज गुण

स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।


एक आधुनिक interpretation

यदि इस कविता को आज की भाषा में कहें, तो उसका अर्थ कुछ ऐसा होगा:

  • अपनी क्षमता पर विश्वास रखो

  • procrastination छोड़ो

  • victim mentality में मत जीओ

  • meaningful work करो

  • अपना रास्ता स्वयं बनाओ

  • निराशा को identity मत बनने दो


यह कविता केवल motivational poem नहीं है;
यह भारतीय आत्मा के कर्मयोगी स्वर की कविता है।